यदि खुशी अंततः हमें अपने भीतर से मिलनी है तो कैसे पता चलेगा की हमें अपने बाहरी जीवन में कहाँ बदलाव लाना है ?और इसकी प्रेरणा हमें कहा से प्राप्त होगी ? ये सवाल काफी चुनौती भरे हैं और हम सब इस सवाल से जूझते है। एक तरफ हमें कहा जाता है की हम ख़ुशी को अपने भीतर खोजे। और हम हमेशा खुश रहे , चाहे जैसा भी हालात हो। यह भी की अगर ख़ुशी को हम अपने से बाहर खोजते हैं तो प्रसन्न नहीं रह सकते। यह निरंतर खोज होगी जो हम कभी पा नहीं सकते। हमारी ख़ुशी भविष्य में कही छुपी रहेगी। हमारी पकड़ से बाहर। और ये बात गलत भी नहीं है , सच है।

हम जानते हैं की हमें खुद को ये बाते नहीं कहनी चाहिए।

  • मै तब खुश हो सकूंगा जब…………………………………….।
  • अगर ऐसा नहीं हुआ तो सब बेकार है।
  • वो मिले तभी हम खुश रह सकते है नहीं तो नहीं।

फिर भी हम इस तरह की बाते करते हैं बार बार हर बार करते हैं। दरअसल हम अपनी खुशियों पर असीमित शर्त थोपते हैं जो हमें खुश रहने में बाधा पहुँचती है। इसलिए हमें हर हालत में खुश रहने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लेकिन इस विचार के साथ एक समस्या है और बहुत बड़ी समस्या है।

मान लीजिये आप ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ख़राब रिश्ते के दौर से गुजर रहा हो तो क्या आप उसे कह पाओगे की उसके गाली गलोच की चिंता मत करो चाहे जैसी भी परिस्थिति हो चाहे जो भी हो तुम खुश रह सकती हो।

मुझे उम्मीद है की आप ऐसा नहीं करोगे यदि आपने ऐसा किया तो आपकी दोस्ती ख़त्म हो जाएगी कारण की हमें ज्यादातर ऐसे लोग पसंद आते हैं जो नायक की तरह चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से जूझ कर आगे बढते हैं। ऐसे लोग जो अपने जीवन में बदलाव लाने की कोशिश करते हैं।

हर बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता

लोकतंत्र के लिए लड़ाई महिला अधिकारों के लिए लड़ाई , अफ़्रीकी अमीरीकी अधिकारों के लिए लड़ाई इत्यादि सामान सिद्धांतो पर आधारित है। लोग यथा स्थिति को स्वीकारने को तैयार नहीं थे। हम भी अपने जीवन में यथा स्थिति को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हम अपने अंदर आतुरता महसूस करते हैं। कुछ बेहतर पाने की भूख आगे बढ़ने की ललक और परिस्थितियों से पार पाने की जिज्ञासा। तो फिर हम दुबिधा से पार कैसे पाए ? हर हाल में खुश कैसे रहे ?

परिस्थितिया जो खुशिया लाती है

  • इस बारे में ईमानदार हो जाए जैसे पौधो को जीवन के लिए कुछ चीजों की जरुरत होती है। वैसे ही मनुष्यो में भी खुशियों के लिए कई परिस्थितियों की जरुरत होती है इनमे खास तौर पर ये हैं।
    • शारीरिक सुरक्षा :- हम सब को शारीरिक सुरक्षा की जरुरत होती है जैसे – हिंसा से सुरक्षा , भोजन की सुरक्षा , निवास की सुरक्षा इत्यादि।
    • मानसिक सुरक्षा :- शारीरिक सुरक्षा के सामान हमें शाब्दिक और भावनात्मक हिंसा से भी सुरक्षा चाहिए। हमारी इच्छा रहती है की हम दुनिया को बताये , हम क्या हैं। दूसरे हमें स्वीकार करे।
    • सामाजिक संपर्क :- मनुष्य सामाजिक प्राणी है दूसरे लोगो से जुड़े बिना हम ख़ुशी महसस नहीं कर सकते।
    • पसंद करने की आजादी :- हम अपनी जिंदगी पर नियंत्रण चाहते हैं , हमें यह महसुस करना अच्छा लगता है की हम अपने हिसाब से अपनी जिंदगी बना सकते हैं। क्या आपके इसके बिना खुश रह सकते हैं। सिद्धांत रूप से हाँ लेकिन व्यवहारिक रूप से बिलकुल असंभव।

हम सब अनूठे हैं

ख़ुशी देने वाली मुलभुत बातो के अलावा हमें इस बात की तारीफ़ करनी चाहिए की हम सभी अलग और अनूठे है। जो आपसे मेल खाता है वह मुझसे अलग है और जो मुझमे है वो आपमें नहीं। उदाहरण के लिए मेरी प्रेमिका को जंगल पसंद है और मुझे पानी से नजदीकी। मेरे मित्र को रेगिस्तान पसंद है , मुझे नौकरी अच्छी नहीं लगती पर मेरे भाई को नौकरी बहुत पसंद है। यह एक लम्बा सिलसिला है। कीचड़ में कमल खिलता है और रेगिस्तान में केक्टस। आपको क्या अच्छा लगता है यह पूरी तरह आप निर्भर करता है। यदि आप मौजूदा हालत में खुश रहने के लिए संधर्ष कर रहे हैं तो उन्हें बदल क्यों नहीं देते तब आप ऐसे वातावरण पाएंगे , जहाँ आप विकास कर सकते हैं और खुश रह सकते हैं।

जिस पर जोर नहीं है

जी हां हमें मान लेना चाहिए की कुछ परिस्थितिया बदल नहीं सकती। जैसे मै अपनी आयु बदल नहीं सकता या अपनी उचाई नहीं बदल सकता या आप इतिहास नहीं बदल सकते ये स्थाई है। लेकिन कुछ अन्य अस्थाई स्थिति भी हैं जैसे आप अपनी नौकरी से घृणा करते हैं , पर आज की माली हालत ऐसी नहीं है की आप नौकरी बदल सकते हैं ऐसे में आप क्या करोगे यदि यह स्थाई स्थिति होती तो आप हार मान कर चुप बैठ जाते , पर अस्थाई होने पर आप वर्तमान में काम करते हुए धीरे धीरे आगे के लिए प्रयास कर सकते हैं।

तीन बाते जो हमें हमेशा याद रखना चाहिए

  1. कई दफा बेहतरीन मौके से हमारी मुलाकात उस समय होती है जब हम सबसे मुश्किल हालत से गुजर रहे हैं। जो मुसीबत हमें तोड़ रही होती है , वही हमें उन बदलाव की ओर ले जाती है जिसके लिए हम चाह कर भी हिम्मत जुटा नहीं पाते थे अपनी सुरक्षित दायरों को छोड़ने से डरते थे प्रोफेशर ब्रेनी ब्रॉउन कहती हैं ‘ कई बार मुश्किल भरे सबक ही जिंदगी की सबसे बड़ी सबक बन जाती है ‘
  2. हमारे चुनाव हमारे विचार और हमारी प्रतिक्रियाए इस बात पर निर्भर करती है की हम कितना जानते हैं दिक्कत कम जानने से भी उतना नहीं होता जितना उस कम को सब कुछ मान लेने में होता है। नतीजा हम वहाँ तक नहीं पहुँच पाते जहाँ पहुंच सकते थे। हीलर लुइस एल हे कहती हैं ” अगर आप सिमित सोच रखते हैं तो वही सोच आपका सच बन जाता है “
  3. हरेक के लिए दुसरो को ना कहना आसान नहीं होता। कई बार तो दूसरे के मतलबी रवैये पर गुस्सा आ रहा होता है इसके बावजूद भी हम अपनी पसंद और न पसंद को परे कर हम मदद के लिए दौर पड़ते हैं। सर्टिफाइड कोच हेली मागी कहती हैं ” हाँ या ना कहने की सीमा होती है। यह सीमा हमारी अपनी सुरक्षा के लिए जरुरी होती है। इसके लिए हमें अपनी जरुरत, इच्छा और मूल्य को समझना पड़ता है। ”
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